कमज़ोर,असहाय, अपाहिज सत्य

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काफी समय पहले मैं मेरे एक वर्षीय भतीजे शाश्वत को हंसाने के लिए अजीब सा चेहरा बनाने की कोशिश कर रहा था । अजीब चेहरा बनाना थिएटर की एक्सरसाइज़ के अंतर्गत आता है । मुझे लगा था वो मेरा चेहरा देख कर खुश होगा, मगर वो डरकर और ज़ोर से रोने लगा । भैया – भाभी को मैंने उसके रोने की वजह बताया और मैंने डिसाइड कर लिया कि अब ऐसा नहीं करूंगा । और मैंने दोबारा उसे इस तरह मुँह बनाकर हंसाने की कोशिश कभी नहीं किया ।

इस घटना के कुछ महीनों बाद एक दिन मैं ऑडिशन के लिए तैयार हो रहा था, शाश्वत झूले में सो रहा था । वो अचानक उठा, मुझे देखा और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा । भैया – भाभी भागते चले आए । शाश्वत मेरी तरफ देखते हुए, कांपते हुए, रो रहा था । भैया को लगा कि मैंने मुँह बनाकर डराया होगा । संवाद जितना याद है वो इस तरह था –

भैया : …डराए थे क्या?
मै : नहीं । वो अपने आप उठकर रोने लगा ।
भैया : …आपकी तरफ ही देख रहा है ।
मै : ( . . . . )
भैया : ऐसे नहीं डराना ।
मैं : (चिढ़कर) लेकिन मैंने नहीं डराया !

अब देखिए :

भैया ने कहा : …डराए थे क्या?
मैंने कहा : नहीं । वो अपने आप उठकर रोने लगा ।

तो भैया का यह कहना कि : ‘ऐसे नहीं डराना ।’ यह साबित करता है कि मेरा पहला कथन / जवाब ‘नहीं । वो अपने आप उठकर रोने लगा ।’ “सच” होते हुए भी झूठ समझा गया, और उस पर संदेह किया गया । “सत्य” स्वयं को उस वाक्य में साबित नहीं कर पाया जबकि मैंने “सत्य” को उस वाक्य में रखा था । मैंने ‘सच’ कहा था । मैंने शाश्वत को उस दिन डराया नहीं था, वो खुद नींद से जागकर, मझे देखकर, कांपने लगा था और रोने लगा था । (शायद कोई डरावना सा सपना देखा हो और जागकर रोने लगा हो।)

यह बड़ी छोटी घटना थी ।
लेकिन मैं उस पूरे दिन ऑडिशन्स पे भटकते हुए सोचता रहा कि ‘मेरे “सच” कहने का यकीन क्यों नहीं हुआ!’

बड़ा सवाल यह है कि जब लोग झूठे आपराधिक केसेस् में जेलों में बंद हैं, जो कोई किसी अफवाह से बदनाम हुआ, कोई खुद होकर दूसरे का इल्ज़ाम अपने सर लेते हैं, किसी को जानकर फंसाया जाता है, तब ‘सत्य के ताक़तवर’ होने की बात ग़लत है!

अगर महाभारत की “अर्ध-सत्य” वाली घटना ऐतिहासिक है तो लानत है ‘सच’ पर! और ‘सच’ के सारे महिमामंडन झूठे हैं ।

बात का सच होना ना होना मायने नहीं रखता । बात को कौन – कब – कहां और कैसे रख रहा है, इससे तय होता है कि बात का कितना वज़न होगा और बात को कितना माना जाएगा । पहले के अनुभव और उदाहरणों से भी बात प्रभावित होती है । अगर एक बार पहले शाश्वत द्वारा मेरे बिगड़े चेहरे को देखकर रोने का पूर्व उदाहरण नहीं होता तो मेरी बात पर भैया को संदेह नहीं होता ।

सच का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं । वो समय – व्यक्ति – तरीके पर निर्भर है । सच झूठ का विलोम नहीं । एक – दूसरे के समावयवी जैसे हैं । एक नहीं है । एक – दूसरे से स्वतंत्र भी नहीं ।

झंझट है ।

पाप – पुण्य की काल्पनिक निधि का सच – झूठ से तआल्लुक़ बेवजह है । सिर्फ लोगों को नैतिक बनाए रखने के लिए । और नैतिकता भी वो जो पुराने ज़माने के चालाक लोगों द्वारा अपने फायदे के लिए बनाई गई ।

सच और झूठ, ताक़तवर या कमज़ोर नहीं हैं । वो ‘बात – कथन – वचन’ सच या झूठ होते है, और हां, ये भी “कार्य-कारण सिद्धांत” की कड़ी का हिस्सा होते हैं । इनसे भी परिणाम जन्मते हैं और कारण बनते हैं ।

जो लोग खुद को सही साबित नहीं कर पाते, और जिनसे जुड़े ‘सत्य’ कभी सामने नहीं आ पाते, वो मेरी बात बेहतर समझ सकते हैं ।

किसी भी सच के साबित होने, झूठ की पोल खुलने जैसी जन-साधारण की खोखली उम्मीदभरी बात पे विश्वास खुद को खोखला कंफर्ट देना है ।

जिनके पास पाॅवर है, सच उनका है । कृष्ण ने कहा कि ‘मैं जिस तरफ हूं, सत्य उस तरफ है।’ मतलब अमेरिका जनसंहार कर जस्टिफाई कर दे तो सच उसका । हत्या को वध और वध को बलि साबित कर दें तो सच उनका ।

कमज़ोर सच!

गलतियाँ उनकी है जिन्होंने बात को सच झूठ में बाँट कर देखना सिखाया । मक्कार थे वे लोग । या शायद अज्ञानी ।

यह है । यह बुरा है । यह होता है । और ऐसा करने-करवाने वाला कोई अदृश्य – काल्पनिक शासक – मित्र – शत्रु नहीं है । सब यहाँ के चालाक इंसानों की घोटालेबाज़ी है ।

जाॅन एलिया साहब का शेर है:

मेरी हर बात बे-असर ही रही,
नुक़्स है कुछ मेरे बयान में क्या ।

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