देश, राष्ट्र और विश्व समाज

देशभक्ति राष्ट्रवाद के लिए घातक है, और राष्ट्रवाद वैश्विक मानवता के लिए एक बाधा ।

देश, मुल्क या Country एक भौगोलिक इकाई है जो किसी भूखंड और उसके निवासीओं को जलवायु, संस्कृति, भाषा, रिवाज़ आदि द्वारा दूसरे भूखंड से अलग करता है । व्यक्ति अपने देश के प्रति भावनात्मक लगाव महसूस करता है । यही वह जमीन होती है जिसे व्यक्ति अपनी मातृभूमि और यहां की भाषा को मातृभाषा के रूप में पहचानता है । हर संस्कृति अपनी मातृभाषा और मातृभूमि पर गर्व करना सिखाती है । कहा भी गया है : जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।

दूसरी तरफ राष्ट्र, वतन या Nation एक राजनीतिक इकाई है । जमीन, पानी और हवा पर खिंची अप्राकृतिक एवं काल्पनिक राजनीतिक सीमाओं के भीतर रहने वाली जनसंख्या जो किसी संप्रभू राज्य का की पहचान हो, राष्ट्र कहलाती है । एक राष्ट्र में अनेक देश हो सकते हैं, होते हैं । एक ही राष्ट्र के दो अलग अलग व्यक्ति एक ही समय अपने अपने देशों और भाषाओं के प्रति एक सा लगाव रखते हैं जबकि एक दूसरे के देशों और भाषाओं के प्रति उनका वैसा लगाव नहीं देखा जाता । संभव है कि किसी दूसरे राष्ट्र में जाने पर उनमें एक राष्ट्र से होने की भावना आपस में जोड़ती हो ।

जब राष्ट्र की भावना सर्वोपरि हो तो एक राष्ट्र का नागरिक होना ही जनसंख्या की प्रथम और अंतिम पहचान होती हैं, किसी वर्ग समूह की समस्या व उत्सव संपूर्ण राष्ट्र की समस्या और उत्सव होते हैं । राष्ट्रीय भावना के अभाव में जनसंख्या अनेक जातियों, भाषाई समूहों, धार्मिक संगठनों, व्यावसायिक वर्गों के रूप में अलग अलग इकाइयों का निर्माण करते हैं, जो भौगोलिक क्षेत्रों के अनुसार देशीय संरचना प्राप्त कर लेते हैं । ये देश, किसी भी राष्ट्रीय भावना के विकास में अवरोध उत्पन्न करती है और राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध होती है ।

वैश्विक मानव समूह भी भाषा, नस्ल, देश आदि में खंडित है । यह पहचान का सही तरीका तो नहीं मगर प्राकृतिक है । इसके विपरीत भूमि – जल – वायु – जनसंख्या को राजनीतिक सीमा रेखा से विभाजन किया जाना अप्राकृतिक हैं । कभी जब समान जलवायु – भाषा – जन वाले क्षेत्र राजनीतिक सीमाओं से बांट दिए जाते हैं तो तकलीफ होती है ।

संपूर्ण मानव समाज वैश्विक समाज के निर्माण की ओर अग्रसर हो पाता तो बेहतर होता । टाॅमस पेन, भगतसिंह, चे, मानवेंद्र.. राममोहन, टैगोर, और वो लोग जिन का मुझे नाम भी नहीं पता, मगर आज से पहले वैश्विक समाज का हिस्सा बन चुके थे, महान थे । कृष्णामूर्ति (जिड्डू व यूजी, दोनों), ओशो, और अब बालेन्दु, ये लोग अब किसी देश नस्ल भाषा राष्ट्र जाति धर्म से बाहर निकल चुके हैं । जिन्होंने ‘अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैवकुटम्बकम्॥’ कहा, वो छोटीसोच से बाहर निकल चुके लोग रहे होंगे ।

अब तक यही देख पाता हूं कि वैश्विक समाज सिर्फ आर्थिक रूप में ही संभव हो पाया है ।

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