बहुत ज़रूरी काम (Short Story)

हम दोनों का साथ में बिताया हुआ ये पहला दिन था । शाम होने लगी थी मगर अलसाया हुआ दिन अभी बाकी था । वो बिना कुछ बोले उठी और बाल संवारने लगी । लंबे काले बालों की घनी, मोटी वाली चोटी । थोड़ा मेकअप ठीक किया और पतले कमानी वाली सैंडल में पैर फंसाने लगी ।

‘नीचे तक चलोगे या मैं जाऊँ?’

मैंने सिगरेट को एश-ट्रे में मसल दिया । उठा, शर्ट ठीक किया, और चप्पल पहन कर बाहर आ गया । लेडीज़ फर्स्ट वाली ना तो मुझे आदत है और ना ही ऐसा कोई थोथा शिष्टाचार मुझे पसंद है । लेकिन मैं औरतों का सम्मान करता हूं, और तमीज़ से बात करता हूं । तमीज़ क्या होती है, मुझे पता है ।

‘बड़ा बोरिंग डे था’ वो बोली ।

‘नहीं, मैं बोरिंग हूं । मैं हमेशा से लड़कियों के लिए नाइस मगर बोरिंग रहा हूं।’

‘कितनी लड़कियों के लिए बोरिंग रहे हो? मुझे नहीं लगता कि इतनी सारी रही होंगी कि तुम ‘लड़कियाँ’ वर्ड का यूज़ करो।’

‘क्यों? तुम्हें लगता है कि मैं बड़ा शरीफ हूं तो मैं लड़कियों से वैसी उस टाईप की दोस्ती नहीं कर सकता? तुम भी तो दोस्त हो ना!’

‘मेरी बात अलग है ।’

दोनों लिफ्ट से बाहर आ गए और गेट की तरफ बढ़ने लगे ।

‘तुम्हारी बात अलग कैसे है?’

‘बस है ।’

‘कैसे?’

‘ऐसे ही ।’

‘मतलब यूँ ही, कुछ भी। कुछ नहीं तो ऐसे ही, कुछ भी बोल दीं। वजह रहे ना रहे, बस ऐसे ही?’

‘मुझसे ऑर्ग्यूमेंट कर रहे हो?’

‘नहीं तो?’

‘तो फिर?’

‘फिर क्या?’

‘ऑटो कहां से मिलेगा?’

‘मैं छोड़ दूं? ऑटो तक?’

और दोनों चुपचाप एक तरफ चलने लगे ।  मैं नहीं चाहता था कि उसे ऑटो मिले । बस भी जाती है उस तरफ । बीस मिनट की फ्रीक्वेंसी पे गोरेगांव की बस आती रहती है । बीस मिनट और साथ रहने की संभावना तो है; और बस लेट हो तो और अच्छा । मगर 9 बज गए हैं और उसे घर पहुँचते पहुँचते 10:30 बज जाएगा । कब खाना बनाएगी, कब खाएगी । बनाएगी भी या भूखी ही सो जाएगी । अलाल है । अच्छा हुआ अभी तक शादी नहीं की । गृहिणी वाले कोई लक्षण नहीं इसमें । लेकिन सुंदर है । ज़्यादा पढ़ी नहीं है, लेकिन अंडरस्टैंडिंग अच्छी है ।

‘यहाँ से कौन – कौन सी बस जाएगी? ऑटो नहीं मिलेगा क्या?’

‘यार ऑटो में लंबा खर्चा बैठेगा । बस सही है यहाँ से ।’

‘तुम अपनी चीज़ थोपते हो ।’

‘मैं सिर्फ तुम्हारा खर्चा बचा रहा हूं ।’

और बात करने की इच्छा है। मगर क्या बात करूँ? बात करने वाली बात थकाऊ होती है । अनर्गल । फालतू । संवाद में सूचनाओं का आदान प्रदान ज़रूरी है नहीं तो बात चीत फर्ज़ी है । यहाँ असल में बात करने से ज़्यादा ज़रूरी साथ में रहने की इच्छा है । बस आती दिख गई ।

‘ये जाएगी?’

ये बस जाएगी मगर मैं कहना चाहता हूं कि नहीं ये बस नहीं जाएगी ।

‘हाँ, ये जाएगी ।’

मुँह से झूठ या तो निकलता नहीं है, या फिर कांपता हुआ निकलता है । सच अपने साथ दुख लेकर मुँह से निकलता है । दिमाग को सब पता है । चालबाज़ी सबको तो नहीं आती न?

बस आ गई । वो बस की तरफ दौड़ पड़ी । मैं भी दौड़ पड़ा । जैसे ही वो बस में चढ़ने लगी, मेरे मुँह से निकल पड़ा,

‘यार तुम रूक नहीं सकती क्या?’

‘वो रुक गई, मेरी तरफ देखने लगी । बाकी लोग जल्दी जल्दी बस में चढ़ने लगे ।’

‘खाना मैं बना लूंगा । तुम चाहो तो हेल्प करना ना करना । मैं जैसा भी बना लूंगा । अच्छा नहीं लगे तो भी खा लेना । या बाहर से कुछ पैक करवा लें….?’

वो आंखों में चमक लिए मुस्कराती हुई मुझे देखती रही और जैसे ही मैं चुप हुआ, वो हंसने लगी । मैं गंवार हूं । मुझे कुछ समझ नहीं आया । मैं समझना भी नहीं चाहता । और हम दोनों वापस मेरे घर की तरफ चलने लगे । मैं खुश था कि मुझे एक दिन के बाद एक रात भी मिल गई । उसके मन में क्या चल रहा था मुझे नहीं पता, लेकिन वो भी मुस्कुरा रही थी, मैंने देखा । मुझे ऐसा लग रहा था जैसे एक बहुत बड़ा और ज़रूरी काम हो गया ।

— श्रद्धांशु शेखर

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Short Story by Me
Photo: Facebook

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