भसड़ 

‘भसड़’ शब्द

भीड़ द्वारा

किसी दिशा की ओर

बिना किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए

भागने के प्रत्यय को

प्रेषित करता है ।
यह भीड़ अनियंत्रित, नियंत्रित

और नियंत्रण के षड्यंत्र का शिकार भी हो सकती है ।
इसमें पलायन की भावना भी संभव है

जो किसी भय, अभाव, विचार-शून्यता, से होता हो ।

चरवाहा, डंगर को हाँकता है ।

डंगर भागते हैं ।

चरवाहा, डंगर को हाँकता है एक दिशा की ओर

डंगर भागते हैं एक-अनेक दिशा की ओर से एक दिशा की ओर ।

यह ‘भसड़’ है जो चरवाहे के भय के कारण है ।
डंगर घर की ओर नहीं भागते,

वे केवल उस ओर से भागते हैं जिस ओर से चरवाहा हाँक रहा होता है ।
डंगर के भागने का कोई लक्ष्य नहीं होता ।

भागने का कोई लक्ष्य होता भी नहीं,

लक्ष्य होता है पहुँचने का ।

डंगर भागते हैं चरवाहे से, और पहुँच जाते है घर ।

डंगर परिभाषा बदल देते है ।
चरवाहे मर जाएँ

तो भी डंगर घर पहुँच ही जाते हैं

समय पर, शाम होते तक, रात होने से पहले

बिना कोई भसड़ मचाए ।
भसड़ चरवाहे का दोष हैं

डंगर का नहीं ।

जो कुछ लोग चरवाहा बने हैं

वे असल में मालिक हो जाने के भ्रम से ग्रस्त हैं,

सभी नहीं लेकिन बहुत से ।

13:01 Tuesday

9th of August 2016

Advertisements

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s