शब्द की आत्मनिर्भरता 

​हर दो शब्दों के बीच इतना फासला है कि उनको एक दूसरे से कोई मतलब ही नहीं है । वे न तो एक दूसरे पर निर्भर हैं और ना ही समावयवी । वे एक दूसरे के सहयोगी प्रतीत होते है । उन्हें एक दूसरे के सहयोग की जरूरत नहीं हैं । जो समझना चाहता है वो इन शब्दों को साथ रखकर पढ़ता है ।
शब्दों को साथ रखते समय यह देखा जाता है की उनसे कोई अर्थपूर्ण वाक्य बने । अगर बना हुआ वाक्य अर्थपूर्ण न हो तो शब्दों को दोषी माना जाता है । शब्दों का क्या दोष? शब्द तो अपने आप में पूर्ण है, अर्थयुक्त है । अब इसे अगर दूसरे शब्द या शब्दों के साथ रखकर पढ़ा जाए और अर्थ ना बनें तो इसे शब्द का दोष ना माना जाना चाहिए । उस शब्द को किसी अन्य शब्द की ज़रूरत नहीं थी ।
मैंने कहा – “और?”

“किधर?”

“यहीं”

“अच्छा”

“ठीक”

“बाय”

“बाय”

हो गइ बात !
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क्या चल रहा है?

फाॅग चल रहा है ।
अब बोलो !

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