भीतर की शांति 

सबसे ज़रूरी है

आत्मिक शांति का होना

स्वयं को शांति में रखना

स्वयं को शांत रखना ।
शांति,

जो किसी भीतरी या बाहरी

ताकत, डर, नफ़रत, लालच

की वजह से न हो ।
सब तरफ़ शांति को भंग करने के साधन हैं

मगर भीतर का मौसम

खुद लेकर चलना होता है

बाद में यह नहीं कह सकते कि मेरा मन उस वजह से खराब था ।
भीतर के मौसम के ज़िम्मेदार हम खुद हैं ।

अगर मौसम अच्छा तो खुशियाँ हैं ।
अपराध, ज़्यादतियां, अन्याय, हो रहे हैं

शांति का मतलब इन सबसे आंखे मूंद लेना भी नहीं है

अगर हलचल न हो तो आदमी मरा हूआ समझो ।
नफ़रत, गुस्सा, कंपेरिज़न, अंतस को विचलित कर देते हैं ।
पूरी कोशिश इस बात की है कि दिमाग़ शांत रहे ।

बाहर से आई कोई भी संवेदना – सूचना भीतर को विचलित न करे । 
बाहर जो हो रहा है

वो एक अकेले के बस का है भी नहीं कि उसे रोक ले ।

मगर बाहर से जो भीतर सूचना आती है,

उससे उत्प्रेरित न होना बहुत कठिन है ।
22:53 Wednesday, 5th October 2016

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