तृष्णा को काट दो ।

​ तृष्णा को काट दो ।
       सारिपुत्त थेर ने शिष्य सुवणकार को ध्यान के लिए अशुभ कर्म स्थान दिया और सुवणकार भिक्खु विपश्यना ध्यान में लग गया । उसने बहुत कोशिश की लेकिन ध्यान साधना में कोई प्रगति नहीं हुई । तब सारिपुत्त ने शिष्य सुवणकार को तथागत पास ले गए और हकीकत से अवगत किया  । वृतांत जानकर तथागत ने उस सुवणकार के चित्त की चेतना देखकर,  एक सुवर्ण पद्म पुष्प दिया और कहा कि वह उस पुष्प को बालू रेत पर स्थापित करके ध्यान भावना करें । भिक्खु ने तथागत ने जैसे बताया वैसे किया और विपश्यना करने लगा । भिक्खु ने जब चतुर्थ ध्यान को प्राप्त किया तब उनकी ध्यान समापत्ति को जानकर तथागत ने ऋद्धिबल से उस पद्म पुष्प को म्लान कर दिया । सुवणकार ने उस सुवर्ण पद्म पुष्प के बदलते रंग को देखा, इसको देखते हुए उसे अनित्य बोध होने लगा । वह अनित्यता उसने अन्य वस्तुओं में भी देखी, अवधारित की और अनित्य लक्षण का साक्षात्कार किया ।
       भगवान श्रावस्ती के जेतवन विहार में बैठे थे । भगवान ने सुवणकार की चित्तवृत्ति को जान चुके थे, वे सुवणकार भिक्खु के ध्यान में उपस्थित हुए और बोले,

  “भिक्खु  ! तृष्णा को काट दो ।”
भगवान ने कहा —
*”उच्छिन्द सिनेहमत्तनो, कुमुदं सारदिकं’व पाणिना ।*

*सन्तिमग्गमेव ब्रूहय, निब्बानं सुगतेन देसितं ।।”*
         जिस तरह हाथ से  शरद ऋतु के कुमुद को तोडा जाता हैं, उसी तरह स्व-स्नेह को उच्छिन्न कर डालो और सुगत द्वारा उपदिष्ट शान्ति मार्ग का आश्रय लो ।
        *मनुष्य के जीवन में वासना का सूत्र हैं, बडा कोमल, सुन्दर, प्यारा मगर एक झटके में टूट जाता हैं, झटका देने की हिम्मत चाहिए ।*
         थेर सुवणकार के समान सब को अनित्य बोध जागे और निर्वाण सुख की प्राप्ति हो, यही मंगलकामना ।
🌷 *सबका मंगल हो* 🌷

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