बाहर भीतर के विश्वास !

​अगर धार्मिक श्रद्धा, कर्मकांड, देवी-देवताओं पर आस्था, आध्यात्मिक विश्वास, अंधविश्वास, टोने-टोटके, पूजा-पाठ, राजनैतिक विचारधारा, का जीवन में अनुकरण संभव नहीं है तो वे बेकार है ।
अगर अनुकरण संभव तो है मगर अप्लाई नहीं कर पा रहे हैं, तो सिर्फ किताबी बात है, बातचीत का विषय है, टाइम पास है ।
अनुकरण और अप्लाई कर पा रहे हैं लेकिन मज़ा नहीं आ रहा हो, दिमाग असंतुष्ट हो, खिन्नता हो, भीतर और बाहर का जीवन असंतुलित हो, — तो,
या तो सिद्धांतों, विश्वासों, विचारों के निष्कर्षों में गड़बड़ है
या वे सिद्धांत, विश्वास, विचारों के निष्कर्ष असल मूल नहीं हैं,
या किसी और के लिए होगे ।
मुझे ताईची में मज़ा आता है ।

चार आर्य सत्य एप्लीकेबल और दृष्टांत है; साक्षात हैं ।

बाबा साहब, जय भीम ।

सार्त्र की बात कि ‘होना, होने के विचार से पहले और महत्वपूर्ण है’ गजब है ।
और ये जो ‘तीन ख़ज़ाने’ मेरे हाथ लगे हैं, यह बड़ी उपलब्धि है – क्योंकि,

मैं उतना बड़ा वैसा साधक नहीं था जो पका-पकाया मिल गया ।

उसके पहले सिर्फ़ अनुमान – अंदाज़ा था, मुहर एक साल पहले 13 मार्च को लगी ।
बाबूजी सुबह उठकर बिस्तर पर ही बैठे बैठे श्वांस को देखा करते थे । उनमें पाॅवर भी था । उनका बनाया पानी काम करता था । काशीराम की पान की दुकान नहीं चल रही थी, पानी मारे तो छटपटाता था काशीराम । बाबूजी नौ साल जल्दी मर गए । उन्हें अभी ज़िंदा रहना था । मैं बहुत सी बातें जो अब जान पाया हूं, उन्हें बता पाता ।
बाबूजी का आंबेडकरी बौद्ध धर्म, नवयान सही था उनके लिए । मैंने सार्त्र, ताईची और ताओ को एड कर लिया । मैं भी भीतर से संतुष्ट हूं, बाहर की समस्याएँ थोथी नैतिकता के कारण खुदबुदबुदा रही हैं ।
अभी मैं नैतिकता उतार फेंकू तो दुनिया दिगम्बर हो जाएगी ।
21:37 Wednesday 8th March 2017

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