दिखाने को दिखाना ज़रूरी है।

दिखाओ कि तुम दिखा रहे हो! उन तमाम विविध अन्दाज़ों में
जिन्हें तुम तब दिखाते हो, जब यह दिखाना होता है
कि लोग कैसे अपनी भूमिकाएँ अदा करते हैं,
दिखाने का अन्दाज़ कभी नहीं भूलना चाहिए
हर अन्दाज़ के पीछे दिखाने का अन्दाज़ मौजूद होना चाहिए
यह इस तरह होगा : यह दिखाने से पहले
कि कैसे कोई आदमी किसी को धोखा देता है या
ईर्ष्या से भर उठता है, या कोई सौदा पक्का करता है,
पहले दर्शकों की तरफ़ देखो, गोया तुम कहना चाहते हो :
‘अब ज़रा ग़ौर करें, यह आदमी किसी को धोखा
दे रहा है और इस तरह से दे रहा है,
जब वह ईष्या से भर उठता है तब ऐसा दीखता है,
और जब सौदा तय करता है तो ऐसे करता है’
इस तरह तुम्हारे दिखावे में दिखाने का अन्दाज़ आएगा,
जो भी बनाकर तैयार किया गया है उसे पेश करने का, पूरा करने का
और लगातार आगे बढ़ने का अन्दाज़
सो दिखाओ कि जो तुम दिखाते हो वह ऐसा है जिसे रोज ही दिखाते हो
और पहले भी अक़सर दिखा चुके हो, और तुम्हारा नाटक
किसी बुनकर के बुनाई करने सरीखा, किसी शिल्पकार की कृति सरीखा होगा
और जो चीज़ दिखाने से जुड़ी है, जैसे कि देखने को
ज़्यादा आसान बनाने में तुम्हारी लगातार दिलचस्पी,
हर प्रसंग केा हमेशा बेहतरीन ढंग से दिखाने की पूरी कोशिश,
उसे भी तुम्हें प्रकट करना चाहिए, तब यह सब
धोखा देना और सौदा करना और ईष्या से भर उठना
रोज़मर्रा के कार्य–व्यापार का स्वभाव लिये हुए होगा,
मसलन खाना खाने, सुबह नमस्कार करने
और अपना काम करने सरीखा (आख़िर तुम काम ही तो कर रहे हो न?)
और मंच पर
अपनी भूमिकाओं के पीछे तुम्हें ख़ुद भी उन्हें अदा करने वालों
के रूप में दिखते रहना होगा।
(दिखाने को दिखाना ज़रूरी है)

— ​बर्तोल्त ब्रेख़्त
अनु. : मंगलेश डबराल

(Whatsapp Post)

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