No Empty Hands!

​Dhamma is always with me.
It was with me before I came here. It was with me when I was born. It is still with me and it will be with me even when I am leaving.
They say –

‘You came here empty hands and you will go with empty hands’

Is true for them who see the Results.

The True and more important is

the Cause, the Source of Results.
They, who know the Way, know,

Dhamma is always there.
I was in Dhamma before I came here. I was in Dhamma when I was born. I remain in Dhamma and Dhamma will be there with me even when I am leaving to Dhamma.
I Know The Way 🙂
04:31 am Saturday 1st July 2017


Dhamma : Pragya And Karuna

Dhamma is neither a Religion nor Dharma! Dharma, a Sanskrit word has three different concepts :

Duty or moral responsibility – it’s dharma of a son to take care of his old parents

Religion in western – to perform rituals and follow rules to get moksha after death

Nature of something / someone – it’s dharma of water to flow and settle down at low
But ‘Dhamma’ is different. Unlike Brahminism, Islam, Christianity, Dhamma means Law Of Nature! It’s Tao! Here you can’t see conflict between religions or their holy books. Here you need no priests to perform rituals but a cultivator friend with a little more experience who guides you to The Path of Buddhas. No matter that your friend is normal person living simple life, he maynot be an angel, he is not a Bodhisattva but his cultivation is enough to lead one towards The Holy Path of Nature. Buddha says, ‘Dhamma is appropriate and right way to follow your life in its natural way. Ignoring or brushing aside the Law Of Nature causes suffering. It’s not any God or imaginary person there to punish or reward you for your wrongdoing or right doings. This is fundamental, simple and easy for one to understand and follow.
I breath naturally, and I feel a kind of completeness, happiness and peace within myself. If I’m involved in thoughts or under control by my emotions, I cannot breathe normally. And so I feel sufferings. Breathing natural is an example of that Great Path, concentrating on inhale and exhale is another exercise some people do but that is escape from knowing.
Buddha says, there are two main pillars of the Dhamma :

– Pragya/Pradnya

– Karuna
Pragya is a state of mind which is completely stilled emptiness. It’s free from any comparison, duality, right or wrong, good or evil (Nirmal Buddhi). He didn’t left any point that could mislead the traveller, so he accepted Pragya as one of two pillars of Dhamma,

..and Karuna is combined practice of Metta/Love, Kindness, Peace, without getting attached with. Without Karuna, a healthy society cannot survive.
12:15 p.m. Tuesday 6th June 2015

Dhamma : Not a Religion

Buddha says – Do not waste time and energy to search for Ishwar or Brahma. There is nobody to come from the sky and help you.
You cannot go against Ishwar in religion. You cannot disdain holy books. If you use your intellect which goes against religious books, you are criticized. Dhamma teaches you to think, doubt, go against it to examine, and believe only if you find something is right.
Religion teaches to have Faith in someone imaginary who comes to help you when it’s needed. Dhamma teaches Atta Deep Bhava – become your light yourself.
Buddha says – I do not give you Nirvana, Moksha, Salvation, Freedom from suffering. I just show you the way. Dhamma is a humanitarian way to live a peaceful life.
Many of us, who believe that Dhamma and Religion are the same, need to analyse carefully. Religion has to be accepted, to get into it, with rituals, while Dhamma educates one to to find or create his own way. Religion believes in many illogical existences like ghosts, satan, ishwar, soul, atma, rooh, deities, while Dhamma is logical and based on science. Dhamma promotes scientific analytical way to think, doubt and examine before believe in something.
Religion teaches social inequality, discriminations, while in Dhamma, everyone is equal. Dhamma is the education, knowledge which is available to everyone. You find something imaginary person in religion or someone who unsuccessfully tries to prove himself as a representative of that imaginary one, but there is nobody who claims to be doot or only representative of someone imaginary. In Dhamma you see a series of enlightened people who never claim to be Ishwar, or his representatives. They all were human being with great and purr wisdom.
Buddha says :- ‘Buddha’ is the state of highest and purest consciousness when you are balanced, in eternal peace, love and happiness, beyond of all fear and sufferings. They who reach on that level but rejects to achieve Nirvana for people, are Bodhisattwas. Dr. Ambedkar also is considered a Bodhisattwa in that sense He was an Angel who showed a better way to people of India.
Religion is irresistible while in Dhamma you are totally free. Dhamma never forces you to do or not do, believe or not believe in something. Everyone is free to use his intellect with Prabuddha Way.
23:12 Wednesday 17th May 2017

बुद्ध : आत्मा, ईश्वर, मृत्यु, धम्म ।


एक बार तथागत बुद्ध से एक विद्वान पंडित ने पूछा-

पंडित- “आप सब लोगों को ये बताते हैं कि आत्मा नहीं, स्वर्ग नहीं, पुनर्जन्म नहीं। क्या यह सत्य है?”

बुद्ध- “आपको ये किसने बताया कि मैंने ऐसा कहा?”

पंडित- “नहीं ऐसा किसी ने बताया नहीं।”

बुद्ध – “फिर मैंने ऐसे कहा ये बताने वाले व्यक्ति को आप जानते हो?

पंडित- “नहीं।”

बुद्ध- “मुझे ऐसा कहते हुए आपने कभी सुना है?”

पंडित- “नहीं तथागत, पर लोगों की चर्चा सुनकर ऐसा लगा। अगर ऐसा नहीं है तो आप क्या कहते हैं?”

बुद्ध- “मैं कहता हूँ कि मनुष्य को वास्तविक सत्य स्वीकारना चाहिए।”

पंडित- “मैं समझा नहीं, तथागत. कृपया सरलता में बताइये।”

बुद्ध- “मनुष्य की पांच बाह्यज्ञानेंद्रिय हैं। जिनकी मदद से वह सत्य को समझ सकता है।”
1. आँखें- मनुष्य आँखों से देखता है।
2. कान- मनुष्य कानो से सुनता है।
3. नाक- मनुष्य नाक से श्वास लेता है।
4. जिव्हा- मनुष्य जिव्हा से स्वाद लेता है।
5. त्वचा- मनुष्य त्वचा से स्पर्श महसूस करता है।

इन पांच ज्ञानेन्द्रियों में से दो या तीन ज्ञानेन्द्रियों की मदद से मनुष्य सत्य जान सकता है।

पंडित- “कैसे तथागत?”

बुद्ध- “आँखों से पानी देख सकते है, पर वह ठण्डा है या गर्म है, ये जानने के लिए त्वचा की मदद लेनी पड़ती  है। वह मीठा है या नमकीन ये जानने के लिए जिव्हा की मदत लेनी पड़ती है।

पंडित- “फिर भगवान है या नहीं इस सत्य को कैसे जानेंगे तथागत?”

बुद्ध- “आप वायु को देख सकते है?”

पंडित- “नहीं तथागत।”

बुद्ध- “इसका मतलब वायु नहीं है ऐसा होता है क्या?”

पंडित- “नहीं तथागत।”

बुद्ध- “वायु दिखती नहीं फिर भी हम उसका अस्तित्व नकार नहीं सकते, क्योंकि हम वायु को ही हम साँस के द्वारा अंदर लेते है और बाहर निकालते हैं। जब वायु का झोक़ा आता है, तब पेड़-पत्ते हिलते है, ये हम देखते हैं और महसूस करते हैं। अब आप बताओ भगवान हमें पांच ज्ञानेन्द्रियों से महसूस होता है?

पंडित- “नहीं तथागत।”

बुद्ध- “आपके माता पिता ने देखा है, ऐसे उन्होंने आपको बताया है?”

पंडित- “नहीं तथागत।”

बुद्ध- “फिर परिवार के किसी पूर्वज ने देखा है, ऐसा आपने सुना है?”

पंडित- “नहीं तथागत।”

बुद्ध- “मैं यही कहता हूँ कि जिसे आज तक किसी ने देखा नहीं, जिसे हमारी ज्ञानेन्द्रियों से जान नहीं सकते, वह सत्य नहीं है, इसलिए उसके बारे में सोचना व्यर्थ है।”

पंडित- “वह ठीक है तथागत, पर हम जिन्दा हैं, इसका मतलब हमारे अंदर आत्मा है, ये आप मानते हैं या नहीं?”

बुद्ध- “मुझे बताइये, मनुष्य मरता है. मतलब क्या होता है?”

पंडित- “आत्मा शरीर के बाहर निकल जाती है, तब मनुष्य मर जाता है।”

बुद्ध- “मतलब आत्मा नहीं मरती है?”

पंडित- “नहीं तथागत, आत्मा अमर है।”

बुद्ध- “आप कहते है आत्मा कभी मरती नहीं, आत्मा अमर है। तो ये बताइये आत्मा शरीर छोड़ती है या शरीर आत्मा को??”

पंडित- “आत्मा शरीर को छोड़ती है तथागत।”

बुद्ध- “आत्मा शरीर क्यों छोड़ती है?”

पंडित- “जीवन ख़त्म होने के बाद छोड़ती है।”

बुद्ध- “अगर ऐसा है तो मनुष्य कभी मरना नहीं चाहिए। दुर्घटना, बीमारी, घाव लगने के बाद भी बिना उपचार के जीना चाहिए। बिना आत्मा की मर्ज़ी के मनुष्य नहीं मर सकता।”

पंडित- “आप सही कह रहे है तथागत। पर मनुष्य में प्राण हैं, उसे आप क्या कहेंगे?”

बुद्ध- “आप दीपक जलाते हैं?”

पंडित- “हाँ, तथागत।”

बुद्ध- “दीपक यानि एक छोटा दिया, उसमें तेल, तेल में बाती और उसे जलाने के लिए अग्नि चाहिए, ठीक है?”

पंडित- “हाँ, तथागत।”

बुद्ध- “फिर मुझे बताइये, बाती कब बुझती है?”

पंडित- “तेल ख़त्म होने के बाद दीपक बुझता है, तथागत।”

बुद्ध- “और?”

पंडित- “तेल है पर बाती ख़त्म हो जाती है, तब दीपक बुझता है, तथागत।”

बुद्ध- “इसके साथ तेज वायु के प्रवाह से, बाती पर पानी डालने से, या दिया टूट जाने पर भी दीपक
बुझ सकता है।

अब मनुष्य के शरीर को एक दीपक समझ लेते हैं और प्राण मतलब अग्नि यानि ऊर्जा। सजीवों का देह चार तत्वों से बना है।
1) पृथ्वी- घनरूप पदार्थ यानि मिटटी
2) जल- द्रवरूप पदार्थ यानि पानी, स्निग्ध और तेल
3) वायु- अनेक प्रकार की हवा का मिश्रण
4) तेज- ऊर्जा, ताप, उष्णता

इसमें से एक पदार्थ अलग कर देंगे ऊर्जा और ताप का निर्माण होना रुक जायेगा, मनुष्य निष्क्रिय हो जायेगा। इसे ही मनुष्य की मृत्यु कहा जाता है। इसलिये आत्मा भी भगवान की तरह अस्तित्वहीन है। यह सब चर्चा व्यर्थ है। इससे धम्म का समय व्यर्थ हो जाता है।”

पंडित- “जी तथागत, फिर धम्म क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?”

बुद्ध- “धम्म अँधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्ग है। धम्म, मनुष्यों का उद्देश्य मनुष्य के जन्म के बाद मृत्यु तक कैसे जीवन जीना है, इसका मार्गदर्शन करना है। कौन से कार्य करने से कौन से परिणाम होंगे, और मानव जीवन किस तरह से सुखमय और दुःखमुक्त हो सकता है, इसका मार्गदर्शन धम्म ही मनुष्य को करता है।”

पंडित- “धन्यवाद तथागत।”

बुद्ध- “भवतु सब्ब मंगलं”